काल की सीमा से परे एक साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोर

रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्व के उन साहित्य-सृजनकर्ताओं में हैं, जो काल की सीमा से परे हैं। वे संसार के श्रेष्ठतम गीत-कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में दो हज़ार गीतों एवं एक हज़ार कविताओं की रचना की। इसके अलावा उन्होंने कहानियाँ, नाटक व उपन्यास लिखे हैं। इसके साथ ही धर्म, शिक्षा, राजनीति एवं साहित्य जैसे विविध विषयों पर अनेक निबंध लिखे हैं। उनकी समस्त रचनाओं के विषय के केन्द्र में मानव की अभिरुचियाँ ही रही हैं। उनकी रचनाओं का मूल्यांकन उन्हें विश्व के कुछ महान व्यक्तियों के समकक्ष ले जाता है। यदि उनके प्रशंसक उन्हें इतिहास का महान साहित्य-स्रष्टा कहते हैं तो आश्चर्य नहीं लगता है। महात्मा गांधी ने उन्हें ‘गुरुदेव’ कहकर संबोधित किया।
रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 1861 में कलकत्ता में एक अति सम्पन्न परिवार में हुआ। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर, राजा राममोहन राय द्वारा संस्थापित ‘ब्रह्म-समाज’ के अग्रणी लोगों में थे। रवीन्द्रनाथ के बचपन में ही उनकी माँ शारदा देवी का निधन हो गया था।
रवीन्द्रनाथ के परिवार में प्रत्येक सदस्य किसी न किसी कला से जुड़ा हुआ था। तथा उनकी रुचियाँ कला की सभी विधाओं से जुड़ी थीं; चाहे वो कविता हो, पेंटिग हो अथवा संगीत। परिवार में इस प्रकार के वातावरण में उनकी संवेदनशीलता असाधारण रूप से विकसित हुई। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई। फिर विभिन्न विद्यालयों के उपरान्त बंगाल अकादमी में उन्होंने बंगाली, बंगाल का इतिहास एवं संस्कृति की शिक्षा ग्रहण की। 17 वर्ष की आयु में वे यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में अध्ययन के लिए गए, किन्तु एक वर्ष के बाद ही प्रतिकूल मौसम के कारण वापस आ गए। इस दौरान उनकी साहित्यिक गतिविधियाँ चलती रहती थीं। वे कम उम्र में ही गीत और कविताएँ लिखने लगे थे। 1883 में उनका विवाह मृणालिनी देवी राय चौधरी से हुआ। उनके दो बेटे और तीन बेटियाँ हुईं।
1980 में, रवीन्द्रनाथ पूर्वी बंगाल चले गए। वहाँ 1893 से 1900 के अन्तराल में उनकी कविताओं का संग्रह सात भागों में प्रकाशित हुआ। 1901 में उन्होंने ‘विश्व भारती’ विद्यालय की स्थापना की, जो 1921 में विश्व-विद्यालय में परिर्वतित हो गया।

‘गीतांजलि’
वर्ष 1912 उनके लिए विशेष महत्व का रहा। इस वर्ष उन्होंने ‘गीतांजलि’ का अनुवाद अंग्रेजी में किया। इस अंग्रेजी में अनुवादित ‘गीतांजलि’ का परिचय विलियम बटलर येट्स द्वारा दिया गया। विलियम बटलर ने लिखा-
“These lyrics- which are in the original, My Indians tell me, full of subtlety of rhythm, of untranslatable delicacies of colour of metrical invention – display in their through a world I have dreamed of all my life long.”
पूरे विश्व के साहित्यकारों का ध्यान ‘गीतांजलि’ पर गया। 1913 में उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
रवीन्द्रनाथ ने अपने जीवन के सम्बंध में एक लेख लिखा था। उसमें उन्होंने लिखा कि जिस तिथि में उनका जन्म हुआ वह विश्व इतिहास की कोई महत्वपूर्ण तिथि नहीं थी परन्तु बंगाल, अपने इतिहास के जिस महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा था, उस दौर की एक तिथि थी। उस समय भारत में तीन प्रकार के परिर्वतन की धाराएँ चल रही थीं। एक राजा राममोहन राय द्वारा एक आन्दोलन चल रहा था। यह आन्दोलन समाज में व्याप्त उन जड़ पकड़ चुकी मान्यताओं, परम्पराओं जिनमें कोई भी चिन्ह आध्यात्मिकता का शेष नहीं था, के विरुध्द था। राजा राममोहन राय ‘ब्रह्म-समाज’ के संस्थापक थे और इसी के माध्यम से आध्यात्मिकता की धारा को पुन: प्रवाहित करने के लिए जन-जागरण कर रहे थे। रवीन्द्रनाथ का परिवार इस जागरण के अग्रदूतों में था।
जिस तरह आध्यात्मिक विचारों में आत्म-अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता आवश्यक है, वैसी ही साहित्य के क्षेत्र में भी आवश्यक है। उस काल में बंगाल के साहित्यिक जगत् में सृजनात्मकता मृत प्राय थी। बंकिमचन्द्र चटर्जी ने साहित्य के क्षेत्र में पुन: सृजनात्मकता जागृत की। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को स्थान दिलवाया। उनका यह योगदान साहित्य के क्षेत्र में क्रान्तिकारी कार्य था।
तीसरा बड़ा परिर्वतन राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में था। यह पूरी तरह से राजनैतिक नहीं कहा जा सकता था। उन दिनों पश्चिमी सभ्यता के आगमन ने भारत की प्रचलित जीवन-धारा में हलचल पैदा कर दी थी। जो लोग इस पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हो रहे थे वे पश्चिमी जीवन-शैली को आधार बनाकर पुरानी जीवन-शैली को हीनता की दृष्टि से देखने लगे थे। जो लोग पुरानी जीवन-शैली को अपनाए थे, वे अपमानित किया हुआ अनुभव करते थे। इस प्रवृत्ति के विरुध्द लोग अपनी आवाज़ उठाने लगे। व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति देने का प्रयास करने लगा था। इसके साथ ही भारतीय मूल्यों के स्वीकार की प्रवृत्ति भी बढ़ने लगी थी।
रवीन्द्रनाथ जी ऐसे काल में बड़े हुए, जिसके प्रभाव से वे अपने में पूर्वी और पश्चिमी मूल्यों का समन्वय कर सकें। इसके साथ ही उनके व्यक्तित्व के विकास में उनका पारिवारिक वातावरण भी सहायक था। उनका परिवार ब्राह्मण ज़मींदारों में से एक था। अत: वह प्राचीन और मध्ययुगीन भारतीय परम्पराओं को भी जानता था और साथ ही पाश्चात्य शिक्षा और जीवन प्रणाली के अग्रणियों में भी था। अत: रवीन्द्रनाथ ने भारतीय मूल्यों को छोड़े बिना ही नवीन की चुनौती स्वीकार कर ली। भारतीय मूल्यों को अपनाए रहने के कारण ही वे जन-चित्र की अन्तरतम अनुप्रेरणाओं के साथ अपने आप को एक कर पाए जो इनकी अजस्र शक्ति का स्त्रोत भी बना। जो लोग अपनी संस्कृति से विमुख होते हैं वे अपने जातीय जीवन से भी उखड़ जाते हैं और उनकी प्रेरणाओं के स्रोतों में भी कमी आ जाती है।
इसके अलावा एक और बात भी थी जिसने रवीन्द्रनाथ को जन-जीवन के साथ अपने को एक करने में सहायता की। वह थी, उनका प्रकृति के साथ सान्निध्य। जीवन के प्रारम्भिक काल में, वे एक ‘बजरे’ (बड़ी नाव) में, ‘पद्मा नदी’ (बगांल की नदी) के दियारों में महीनों रहे। जिससे वे ग्रामीण जीवन के, उनकी संस्कृति के, अति निकट संपर्क में आए। उस अंचल के जीवन की अनुभूतियाँ, नागरिक संस्कृति से कहीं अधिक गहराई में उनके अन्दर समा गयीं। साधारण लोगों के भरे-पूरे जीवन की संवेदना ही उनकी सृजन शक्ति के मूल में है, जिसने उनकी प्रेरणा-शक्ति को कभी कम नहीं होने दिया।
रवीन्द्रनाथ प्रमुख रूप से कवि थे लेकिन वे संगीतज्ञ भी थे और कला-शिल्पी भी। इसके अलावा धर्म, शिक्षा संबंधी तत्व-चिन्तन, राजनीति, सामाजिक सुधार एवं नैतिक उत्थान के क्षेत्रों में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उनके इस महत्वपूर्ण योगदान के कारण ही उन्हें आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक गिना जाता है।
रवीन्द्रनाथ जीवन को बिना किसी भेद-भाव के पूर्ण और अविभाय इकाई मानते थे। किन्हीं भी आदर्शों या संस्कृतियों के भेद ने उन पर प्रभाव नहीं डाला। इसीलिए उन्होंने कला और जीवन को अलग नहीं माना।
उस समय सौन्दर्य शास्त्र का एक नया सिध्दान्त पूरे यूरोप में छाया था। उसके मानने वालों का मत था कि कला के ही उद्देश्य से कला को अपनाना चाहिए; यह कोई आवश्यक नहीं है कि जीवन से उसका संबंध हो ही। इस सिध्दान्त के अनुयायी कहने लगे थे कि कवि और कलाकार सर्वप्रथम स्वप्नाचारी होते हैं। रवीन्द्रनाथ ने इस मत को कभी स्वीकार नहीं किया कि कला जीवन से विच्छिन्न है। उन्होंने जीवन की अभिव्यक्ति में ही सौन्दर्य ढूंढा। उनका यह भी विश्वास था कि यदि जीवन की अभिव्यक्ति में सौन्दर्य नहीं है तो मधुरता भी नहीं आ सकती। रवीन्द्रनाथ की दृष्टि में कवि धर्म ही मानव धर्म है।
रवीन्द्रनाथ संसार के श्रेष्ठतम गीत कवियों में गिने जाते हैं। उनके गीतों में मानवीय संवेदना की सच्चाई और भाव-चित्रों की सजीवता जब संगीतात्मक पदों से मिलती है तो ऐसे काव्य की सृष्टि होती है कि उनके शब्दों के भूल जाने पर भी उस छंद की संगीतात्मकता मन को आनन्दित किए रहती है। उनके प्रारम्भिक जीवन-काल की रचनाओं में ही ऐसी समन्वयता दिखाई पड़ती है। 20 वर्ष से कम आयु में उन्होंने ‘निर्झरेर स्वप्न भंग’ की रचना की थी, जो आज भी बंग्ला की या किसी भी भाषा के श्रेष्ठतम गीतों में एक है। इसमें भाव-चित्रों की सबलता के साथ ही मनुष्य और प्रकृति की पारस्परिक समस्वरता की बड़ी विशेषता है। रवीन्द्रनाथ के काव्य में यह विशेषता सदैव बनी रही। उन्होंने प्रकृति के प्रत्येक रंग को उसकी ऋतुओं में, रात-दिन में, अपने काव्य में प्रकट किया। उन्होंने वर्षा ऋतु, बसन्त या अन्य ऋतुओं का, उसके बदलते रूपों का इस तरह चित्रण किया है कि उनके गीत एक प्रकार से हमारी विरासत के एक अंग हो गए हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति और मनुष्य एक दूसरे की मनोदशा को प्रतिबिम्बित करते प्रतीत होते हैं। उनका इस धरती में आकर्षण उसकी प्राकृतिक सौन्दर्यता के कारण ही नहीं था वरन इस पर रहने वाले मनुष्यों के कारण भी था। उनका मानव के प्रति प्रेम उनके साहित्य में भरा पड़ा है। मनुष्य की प्रत्येक संवेदना को उन्होंने अनुभव किया। वे ये जानते थे कि जीवन कई तरह के संघर्षों से भरा हुआ है। और संसार में कई त्रुटियाँ हैं फिर भी उनका विश्वास था कि इन्हीं त्रुटियों, क्लेशों, लालसाओं के कारण यह सांसारिक जीवन मनुष्य के लिए और भी प्रिय हो जाता है। मनुष्य के लिए उनका यह प्रेम ईश्वर के प्रति प्रेम में रूपान्तरित हो जाता है।
रवीन्द्रनाथ जीवन के सम्यक ज्ञान की प्राप्ति की साधना में सतत लगे रहने को ही जीवन का वास्तविक गौरव मानते थे। जीवन की परिपूर्णता पाने की आकांक्षा उनकी कविताओं में कई बार प्रकट हुई है।
रवीन्द्रनाथ को अपने देश के प्रति सहज प्रेम था। किन्तु दूसरे देशों के प्रति भी कोई प्रतिद्वंद्विता का भाव भी नहीं था। उनकी सुप्रसिध्द कविता ‘प्रवासी’ में उन्होंने कहा कि सभी जगह मेरा घर है और संसार के सभी हिस्से में मेरा देश। समस्त मानव जाति के साथ एकात्म बोध का यह भाव हमारे राष्ट्रीय गीत में बड़े सुन्दर ढंग से प्रकट हुआ है। इसमें रवीन्द्रनाथ ने भारत-भाग्य-विधाता के रूप में समस्त संसार के जन-गण-मन अधिनायक का आह्वान किया है।
रवीन्द्रनाथ ने मनुष्य के लिए एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की जिसमें उसे पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त हो। उनकी ‘दिव्य-स्वातन्त्र्य’ कविता में उसका वर्णन है-

दिव्य-स्वातन्त्र्य
जहाँ हृदय में निर्भयता है
और मस्तक अन्याय के सामने नहीं झुकता है।
जहाँ ज्ञान का मूल्य नहीं लगता;
जहाँ संसार घरों की संकीर्ण दीवारों में
खण्डित और विभक्त नहीं हुआ;
जहाँ शब्द का उद्भव सत्य के गहरे स्रोत से होता है;
जहाँ अनथक उद्यम पूर्णता के आलिंगन के लिए भुजाएँ पसारता है;
जहाँ विवेक की निर्मल जल-धारा
पुरातन रुढ़ियों के मरुस्थल में सूखकर लुप्त नहीं हो गई;
जहाँ मन तुम्हारे नेतृत्व में
सदा उत्तरोत्तर विस्तीर्ण होने वाले विचारों और कर्मों में रत रहता है;
प्रभु! उस दिव्य स्वतन्त्रता के प्रकाश में मेरा देश जागृत हो!

रवीन्द्रनाथ की शिक्षाएँ दृश्य-जगत् की न होकर मनुष्य की अदृश्य चेतना से संबंध रखती हैं। वे विश्वास करते थे कि प्रेम और वेदना के द्वारा पुनरुत्थान हो सकता है। उनकी आवाज़ हमारे समय की आवाज़ है। वे अपने समय के दिशा-निर्देशक के रूप में रहे। उनके गीत गाए जाते रहेगें; उनके कथन स्मरण किए जाते रहेंगे।

शिव कुमार श्रीवास्तव

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