समर बाक़ी है
अमर आनंद
डगर बाक़ी है, सफर बाक़ी है,
अमर का अभी, समर बाक़ी है।
दौड़ ज़ारी है, मंज़िल की ख़ातिर,
शिद्दत का अभी असर बाक़ी है।
राहों में काँटों के सिलसिले हैं, रहेंगे,
फूलों का अभी मयस्सर बाक़ी है।
वक़्त लेता है, तो लेता रहे इम्तिहान
मजबूत हैं हम, हौसला-ए-जिगर बाक़ी है
बादलों में है अभी, उम्मीदों का चांद,
उस चांद पर मेरी नज़र बाक़ी है।
ज़ारी है मेहनत, भारी है सब्र,
नतीजों का आना, मगर बाक़ी है।
बस इंतज़ार है, लम्हा-ए-ख़ास का,
फ़ासला मेरा उससे, पर बाक़ी है।



