इच्छा पूर्ति

रवीन्द्रनाथ टैगोर

सुबलचंद्र के लड़के का नाम सुशीलचंद्र था। लेकिन अब ऐसा तो होता नहीं है कि जैसा नाम हो, आदमी भी वैसा ही हो। ‘सुबल’ का मतलब है ‘ताक़तवर’, लेकिन वह तो कुछ दुबला-पतला ही था, और ‘सुशील’ का मतलब है ‘अच्छे स्वभाव वाला’, पर, वह तो ऐसा नहीं था।
सुशील अपनी करतूतों से पड़ोस में सभी को परेशान किये रखता था। पर, उसके पिता भी उसको कुछ नहीं कह पाते थे क्योंकि वह उनकी पकड़ में नहीं आता था। वे ठहरे गठिया के रोगी भागना-दौड़ना उनके लिए आसान न था, और सुशील था फुर्तीला, जब देखो तब चंपत हो जाता था।
वह शनिवार का दिन था, स्कूल जल्दी बंद हो जाता था। पर, सुशील स्कूल नहीं जाना चाहता था क्योंकि उस दिन क्लास टेस्ट था। इसके अलावा, वह सारा दिन शाम होने वाली पटाखेबाज़ी की तैयारी में बिताना चाहता था।
जब स्कूल जाने का समय हुआ तो उसने अपने पिता से कहा कि वह स्कूल नहीं जायेगा क्योंकि उसके पेट में दर्द हो रहा है। सुबल को पता था कि उसका पेट-दर्द कैसे भगाया जा सकता है, सो उसने कहा, ”फिर तुम घर पर ही रह सकते हो। हरि पटाखेबाज़ी देख आयेगा। मैं तुम्हारे लिए कुछ टॉफियाँ भी लाया था पर, अब तो तुम उन्हें नहीं खा सकोगे। हाँ, मैं तुम्हारे लिए कड़वी दवा ले आता हूँ!” यह कहकर उसने दरवाज़े पर ताला लगाया और बाहर चला गया।
अब सुशील अजीब उलझन में था। वह टॉफियों से जितना प्यार करता था, दवा से उतनी ही नफ़रत थी। और अब तो वह पटाखेबाज़ी देखने भी नहीं जा सकेगा।
जब सुशील के पिता कप में दवाई लेकर लौटे तो वह झट से उठ खड़ा हुआ, और बोला, ”मैं अब ठीक हूँ। मैं सोच रहा हूँ स्कूल चला जाऊँ।” उसके पिता ने उसे ज़बरदस्ती दवा पिला दी, आराम करने के लिए कहा, और फिर दरवाज़े पर ताला लगाकर चले गए।
सुशील दिन भर रोता रहा और यही सोचता रहा कि अगर मैं अपने पिता जितना बड़ा होता, तो मैं भी जो चाहे कर सकता था, और मुझे कोई कमरे में बंद नहीं कर सकता था।
सुशील का पिता भी बाहर बैठा हुआ सोच रहा था, मेरे माता-पिता के लाड-प्यार ने मुझे बिगाड़ दिया था। मैंने ठीक से पढ़ाई नहीं की। अगर मुझे मेरा बचपन वापस मिल जाए तो मैं समय बिल्कुल बर्बाद नहीं करूंगा और ठीक से पढाई करूंगा।
संयोग से, इच्छा पूरी करने वाली देवी उस समय उधर से गुज़र रही थी उसने उन लोगों की इच्छाएँ सुन लीं और मन ही मन कहा, चलो थोड़ी देर के लिए इनकी इच्छाएँ पूरी कर देती हूँ, फिर देखती हूँ कि क्या होता है।
वह पिता के पास पहुँची और बोली अब से वह अपने बेटे जैसा हो जाएगा, उसी की उम्र का और बेटे से उसने कहा कि वह पिता जितनी उम्र का हो जाएगा।
सुबह-सुबह बूढ़ा सुबलचंद्र बिस्तर से उछल कर खड़ा हुआ। उसने पाया कि उसका शरीर छोटा-सा हो गया है, मुँह के सारे दाँत आ गए हैं। रात को उसने जो कपड़े पहने थे, वे उसके लिए बहुत ढीले और बड़े हो गए हैं। नतीज़ा यह था कि उसकी धोती नीचे घिसट रही थी और उसका चलना-फिरना मुश्क़िल हो रहा था।
उधर सुशीलचंद्र जो सुबह उठते ही शरारतें शुरू कर देता था, इस सुबह बिस्तर से उठ भी नहीं सका। अंत में उसके पिता की चीख-चिल्लाहट ने उसे उठने पर मजबूर कर दिया। उसके कपड़े इतने तंग हो गए थे कि पहने नहीं जा रहे थे। उसके सफेद दाढ़ी-मूछ उग आई थीं, और उन्होंने उसके चेहरे को आधा ढँक लिया था, उसके घने बालों की जगह, उसका सिर एक चमकता हुआ-सा सफाचट मैदान हो गया था।
दोनों की इच्छाएँ पूरी हो चुकी थीं, लेकिन इस बदलाव से बहुतेरी गड़बड़ियाँ होनी शुरू हो गई थीं। सुशील अपने पिता की तरह बनना चाहता था जिससे कि वह जो भी चाहे कर सके। उसने सोचा था कि वह पेड़ों पर चढ़ेगा, तालाब में छलांग लगाएगा, हरे-कच्चे आमों का स्वाद लेगा, और बस इधर-उधर घूमता फिरेगा। लेकिन अचरज की बात यह थी कि उस सुबह इनमें से कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा था। इनकी जगह, वह बरामदे में एक चटाई बिछाकर न जाने क्या सोचता हुआ बैठा रहा।
फिर उसके ध्यान में यह बात आई कि उसे खेलना-कूदना बिल्कुल छोड़ नहीं देना चाहिए, और उसने पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की। एक दिन पहले इस पेड़ पर वह गिलहरी की तरह चढ़ गया था, लेकिन आज तो वह चढ़ ही नहीं पाया। उसने एक कच्ची डाल को पकड़ कर चढ़ना चाहा, पर वह डाल ही टूट गई और वह ज़मीन पर धम्म से गिर पड़ा। उधर से गुज़र रहे लोग उस बूढ़े को बच्चों जैसी हरकतें करते देखकर हँसने लगे। सुशील बिल्कुल जड़ हो गया, वह चटाई पर आकर बैठ गया, और उसने नौकर को पुकार कर कहा,”जाओ मेरे लिए एक रुपये की टॉफियाँ ले आओ।”
सुशील को टॉफियाँ हमेशा से पसंद थीं। जब भी उसके पास पैसे होते वह स्कूल के पास वाली दुकान से टॉफियाँ ख़रीदता था।
उसकी यह इच्छा थी कि जब उसके पास पिता जितना पैसा रहा करेगा तो वह टॉफियों से अपनी जेबें भर लेगा। नौकर उसके लिए पूरे एक रुपये की टॉफियाँ ले आया। उसने एक अपने पोपले मुँह में रखी और उसे चूसने लगा। लेकिन वह तो बूढ़ा था और बच्चों वाली मीठी चीज़ें अब उसे इतना पसंद नहीं आती थीं। उसने सोचा, चलो मैं इन्हें अपने बालक पिता को दे देता हूँ। लेकिन फिर उसने सोचा कि यह ठीक नहीं रहेगा, अगर उसने ज़्यादा टॉफियाँ खा लीं तो वह बीमार पड़ सकता है।
सभी लड़के जो कल तक सुशील के साथ खेल-खेला करते थे उसे बूढ़े के रूप में देखकर भाग खड़े हुए।
सुशील ने सोचा था कि अगर वह अपने पिता की तरह अपनी मर्ज़ी का मालिक़ बन जाएगा, तो वह अपने दोस्तों के साथ दिन-दिन भर खेला करेगा। लेकिन आज अपने दोस्तों की ओर देखकर उसे खीझ हुई। उसे लगा, मैं तो यहाँ शांति से बैठा हुआ हूँ और ये धमाचौकड़ी मचाने के लिए आ गए हैं!
पहले चटाई पर बैठा हुआ सुशील इस बात को लेकर चिंता कर रहा था कि अपने बचपन में पढाई-लिखाई न करके उसने कितना समय बर्बाद किया है, और अगर उसे बचपन वापस मिल जाए तो वह अपनी भूल सुधार लेगा।
लेकिन अब, जब सुबल की इच्छा पूरी हो गई थी तो स्कूल जाने के ख्याल मात्र से उसे कँपकँपी छूटने लगती थी। जब कुछ ग़ुस्से से भरा हुआ सुशील उससे आकर कहता, ”पिताजी, क्या आप स्कूल नहीं जा रहे हो?” तो सुबल अपना सिर खुजाने लगता था और कहता था, ”मेरे पेट में दर्द हो रहा है।”
सुशील इस पर खीझ उठता था, और कहता था- ”स्कूल न जाने के ये सारे बहाने मुझे मालूम हैं। मैं भी ऐसे ही बहाने बनाता था।”
सचमुच, सुशील को ये सब बातें इतनी अच्छी तरह पता थीं कि उसके पिता की सारी बहानेबाज़ी सुशील के आगे बेकार हो जाती। और सुशील अपने नन्हें पिता को स्कूल जाने के लिए मजबूर कर देता। जैसे ही सुबल स्कूल से लौटता, बूढ़ा सुशील ज़ोर-ज़ोर से रामायण का पाठ शुरू कर देता और सुबल को सामने बैठाकर उससे कहता कि वह सवाल हल करे।
शाम को दूसरे बुज़ुर्ग लोग सुशील के पास शतरंज खेलने के लिए आ जाते, सुशील ने, उसी समय सुबल को पढ़ाने के लिए एक ट्यूटर रख दिया, और उसकी कोचिंग देर रात तक चलती रहती।
सुशील को यह भी पता था कि जब उसका पिता बूढ़ा था तो ज़्यादा खा लेने पर उसका पेट ख़राब हो जाता था। इसलिए वह उसे अधिक खाना नहीं खाने देता था। लेकिन इस वक़्त तो सुबल जवान था और ख़ूब भूख लगती थी। वह तो कंकड़-पत्थर भी पचा सकता था। उसे जितना खाने को मिलता था वह बहुत कम था। वह क़ाफ़ी दुबला हो गया और उसकी हड्डियाँ निकल आईं। इससे सुशील को यह लगा कि कहीं वह बीमार तो नहीं हो गया है और उसने उसे कई तरह की दवाएँ और टॉनिक देना शुरू कर दिया।
बूढ़े सुशील को भी कई तरह की समस्याएँ झेलनी पड़ रही थीं। वह लड़कों जैसी जो भी चीज़ें करना चाहता था, अब कर नहीं पाता था। पहले वह किसी नाटक को छोड़ता नहीं था। लेकिन अब अगर वह नाटक देखने जाता तो उसे ठंड लग जाती, वह ज़ुख़ाम-खाँसी से परेशान हो जाता, और शरीर में ऐसी पीड़ा होती कि उसे कई हफ़्तों तक बिस्तर पर रहना पड़ता। वह हमेशा तालाब में ही नहाया करता था। लेकिन अब अगर वह ऐसा करता तो उसके जोड़ों का दर्द बढ़ जाता और ठीक होने में छह महीने लग जाते। इसलिए उसने हर दो दिन बाद नहाना शुरू कर दिया था, वह भी गरम पानी से, और सुबल को भी वह तालाब में नहाने नहीं देता था। अब अगर सुशील बिस्तर से उछल पड़ता था तो उसे हड्डियों का दर्द शुरू हो जाता था और अगर वह पान खा लेता तो पता चलता कि पान को चबाने वाले दाँत तो हैं ही नहीं। अब अगर वह पुरानी आदत के अनुसार आनंदी चाची के मिट्टी के घड़े को पत्थर से फोड़ देना चाहता तो लोग उसकी इस बचकानी हरक़त के लिए उसे फटकारने आ जाते। वह यह नहीं समझ पाता था कि स्थिति को कैसे संभाले!
कई बार सुबलचंद्र यह भूल जाता कि वह तो लड़का है। अपने को पहले जैसा बूढ़ा मानकर वह वहाँ पहुँच जाता जहाँ बुज़ुर्ग लोग बैठे ताश या चौपड़ खेल रहे होते थे, और बड़ों की तरह की बातें करने लगता था। वे लोग उसका कान उमेठ देते और कहते, ”बहुत हुई तुम्हारी बदमाशी, अब जाकर खेलो।”
किसी मौक़े पर वह अपने शिक्षक से कहता, ”मुझे हुक्का दीजिए, मैं पानी पीना चाहता हूँ।” शिक्षक उसे बिल्कुल ही वाहियात लड़का समझकर, उसे बेंच पर खड़े रहने की सज़ा देते।
अगर वह नाई से इस बात की शिक़ायत करता कि वह दस दिन से उसकी दाढ़ी बनाने क्यों नहीं आया, तो नाई पलटकर कहता, ”मैं दस साल बाद आऊंगा।”
पुरानी आदत की मुताबिक़ कई बार वह सुशील को सबक सिखाने के लिए मार भी बैठता। सुशील ग़ुस्से से भर उठता, और चिल्ला कर कहता,”तुम्हें बूढ़े आदमी को मारने की हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम्हें स्कूल में यही सिखाया जाता है?” लोग आकर बीच-बचाव करते और उसके बेहूदा व्यवहार के लिए उसे झाड़ देते।
अंत में सुबल ने ज़ोर-ज़ोर से यह मनाना शुरू कर दिया कि मैं अपने लड़के सुशील जैसा बूढ़ा हो जाऊँ और जो कुछ चाहूँ अपनी इच्छा से कर सकूँ।
इस तरह सुशील भी यह प्रार्थना करने लगा- ”हे! ईश्वर, मुझे फिर से अपने पिता की तरह जवान बना दो, जिससे कि मैं जी भरकर खेल सकूँ। मैं अपने पिता को अपने वश में नहीं रख पा रहा। मुझे इस बात की चिंता बनी रहती है कि न जाने वह कब कौन-सी शरारत कर बैठें!”
इच्छा देवी फिर उनके सामने उपस्थित हुई, और उसने पूछा- ”क्या तुमने अपनी इच्छाओं का मज़ा पूरी तरह से ले लिया है?” उन दोनों ने सिर झुकाकर देवी को प्रणाम किया और बोले- ”माँ, बहुत हो चुका। अब हमें पहले जैसा बना दो।”
इच्छा देवी ने कहा, ”ठीक है। कल सुबह से तुम दोनों फिर पहले जैसे हो जाओगे।”
अगली सुबह, सुबल बूढ़े के रूप में ही उठा, और सुशील ने पाया कि वह पहले जैसा लड़का बन गया है। उन दोनों को लगा जैसे उन्होंने कोई सपना देखा था। सुबल ने गंभीरतापूर्वक कहा, ”क्या तुम व्याकरण का पाठ याद नहीं करोगे?”
सुशील ने अपना सिर खुजलाते हुए कहा, ”पिताजी, मेरी किताब खो गई है।”

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