राष्ट्रीय इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज सिंह गर्जना

डॉ. नंदलाल मेहता ‘वागीश’

सिंह गर्जना’ संज्ञाभिधान से डॉ. हरीन्द्र श्रीवास्तव द्वारा परिकल्पित, संकलित, संयोजित एवं तत्वत: संपादित ‘सावरकर दैनंदिनी’ एक अद्भुत ग्रंथ है। दैनंदिनी-समाश्रय से ग्रंथ-लेखन, कम-से-कम भारत में एक नूतन विधा है। इस विधा में अब तक लिखित जिन कतिपय दैनंदिनी-ग्रंथों का उल्लेख किया जाता है, वे पंडित नेहरू, महात्मा गांधी, सुभाष बोस तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर से संबंधित हैं। इसी परम्परा में, पर लीक से हटकर ‘सावरकर दैनंदिनी’, अन्तर्वस्तु और प्रस्तुति की दृष्टि से एक ऐसी अनुपम कृति है, जिसके केन्द्र में व्यक्ति-विशेष का महिमामंडन नहीं है, अपितु इसके केन्द्र में आत्मविस्मृत भारतधर्मी समाज के उजागरण हेतु लेखक द्वारा किया गया ऐसा शंखनाद गुंजायमान है, जो वर्तुलध्वनिसन्निभ निरंतर वर्धित होता हुआ प्रत्येक पृष्ठ पर अनुस्पंदित हो रहा है, ताकि विभाजक, कुटिल एवं वोटधर्मी भ्रान्ति बंधनों से मुक्त होकर आज का भारतजन अपने राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पित करने वाले अग्निपुत्र विनायक दामोदर सावरकर और उन सरीख़े हुतात्माओं का कृतज्ञ भावेन स्मरण कर सकें, जिसके कारण हम एक संप्रभु राष्ट्र कहलाने का गौरव प्राप्त करते हैं।
क्रांतिकारियों के प्रेरक स्रोत और स्वयं में अप्रतिम क्रान्ति-चिंतक, राष्ट्र-विचारक, स्वातंत्र्य-इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, मन, भाव, संस्कार, नैतिक, चेतना, राष्ट्रभाषा हिन्दी व देवनागरी लिपि-सामर्थ्य के प्रबल पक्षधर वीर सावरकर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संकेन्दित इस दैनंदिनी के एक-एक पृष्ठ पर अंकित ऐतिहासिक उध्दरणों, सार्थक टिप्पणियों और संदर्भित रंगीन चित्रों में पिछली सदी का संपर्ण भारतीय स्वाधीनता समर जीवंत और सवाक् हो उठा है।
एक जनवरी से इकत्तीस दिसंबर पर्यन्त वार्षिक गणना पध्दति से रचित दैनंदिनी-पृष्ठों के शीर्षोपरि अंकित 365 उध्दरण क्रान्ति सूर्य सावरकर के प्रचंड वैचारिक आयामों को सही दिशा में समझने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ये महत्वपूर्ण उध्दरण, विनायक दामोदर सावरकर की राष्ट्रीय इतिहास-दृष्टि और जातीय स्वाभिमान-चिंतक को संपूर्ण तर्कसंगति से प्रस्तुत करते हैं। तिथि, उध्दरण, सपृष्ठ ग्रंथ-उल्लेखन व समापनांश में उन-उन तिथियों के साक्षी वर्षों में घटित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को सटीक एवं सुसंगत भाषिक अभिव्यक्ति मिली है।
स्वाभाविक है कि संपूर्ण दैनंदिनी तिथिबध्दता में है, पर मात्र इतने से तो काल-गणना सीमित नहीं हो जाती। कारण, सभी वर्षों का आगमन भी तिथि के अधीन होता है। इस दैनंदिनी के चरित्र नायक क्रान्तिवीर विनायक दामोदर सावरकर हैं, जो सही और सच्चे अर्थों में राष्ट्रनायक हैं। वीर सावरकर की अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा, आकांक्षा, लालसा, और अभिलाषा नहीं थी। उनके जीवन का तो एक-एक क्षण, बल्कि जीवन की एक-एक साँस, राष्ट्र को समर्पित थी। वे प्रखर क्रान्तिदृष्टा थे। उनकी क्रान्ति-दृष्टि चतुर्दिग्बेधिनी थी। राष्ट्रीय स्वाधीनता के साथ-साथ समस्त भारतधर्मी समाज-संगठन, संघ-शक्ति, जातीय गुण-दोष, ऐतिहासिक भूलों, आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, नूतन-पुरातन औचित्य तथा राष्ट्रभाषा व लिपी पर उनका मौलिक चितंन था। इस दृष्टि से दैनंदिनी में दिए गए उनके साहित्य के 365 उध्दरण भारत के समग्र चितंन और मनोभाव को समझने में सहायक हैं। सावरकर के विपुलायामी चिंतन के आधार ग्रंथों में ’1857 का भारतीय स्वातंत्र समर’ सावरकर विचार दर्शन भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ, क्रान्ति का नाद, क्रान्ति के नक्षत्र, हिन्दुत्व तथा हिन्दुत्व के पंचप्राण शीर्षक विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनके द्वारा लिखित संपूर्ण साहित्य राष्ट्रीय अस्मिता इतिहास, परंपरा, समाज, संस्कृति, जातीय आदर्श, जीवन-दर्शन, भाव-विचार, संवेदन, भाषा, लिपि, भारतीय भावन-संस्कार व अभिव्यक्ति का प्रामाणिक और प्रथम प्राथमिक अभिलेख स्रोत बन गया है।
इन उध्दरणों में विचरित विषयों के रूप में राष्ट्रीय स्वतन्त्रंता-संग्राम, परतंत्रजीवी मनोवृत्ति, जातीय अभिज्ञान व संगठन-स्वरूप, क्रान्ति का बलिपथ, राष्ट्रधर्म, मूलभूत एकता, समानाधिकार, इतिहास गौरव, राष्ट्र-रक्षा, सैन्य बल, धर्म-पंथ-सम्प्रदाय, अस्पृश्यता निवारण, शुध्दीकरण और यहाँ तक कि राष्ट्रभाषा व राष्ट्रीय लिपि पर भी वीर सावरकर का निर्भ्रान्त चिंतन अक्षरित हुआ है।
दैनंदिनी में वार्षिक तिथि-गणना की व्यवस्था के अनुरूप 365 सन्दर्भ-चित्रों सहित कुल 372 रंगीन चित्र अंकित हैं। दैनंदिनी के अग्रभाग में संयुक्त ये 7 चित्र, ग्रंथ के पुरश्चरण मंत्र सरीख़े हैं। इनमें सिंहवाहिनी भारत-माता का मनोहारी चित्र पुरश्चरण-विधान के प्रतिपाद्य-संकल्प को स्पष्ट करता है। यूँ एक पृष्ठ पर इस संकल्प के शब्द-श्रुति रूप में यजुर्वेद का राष्ट्रीय मंत्र और उसका उपयुक्त पद्यबध्द हिन्दी अनुवाद पाठक को जातीय स्वाभिमान से भर देता है। सच बात तो यह है कि सुन्दर-समुल्लसित आर्ट पेपर पर ‘ऊँ’ अक्षरांकित व समन्तात् परिबध्द संदर्भ चित्रों के बहुरंगी वितान ने ‘सावरकर दैनंदिनी’ को एक सुमन-सुसजित चित्र-वीथिका का रूप दे दिया है। इस चित्र-वीथिका में केवल सावरकर नहीं हैं, अपितु भारतीय स्वाधीनता-संग्राम समेत आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व की राष्ट्रीय चेतना और उसक उत्तरवर्ती विस्तार के मुँह बोलते चित्र समूचे भारत-भाव का दृश्यांकन प्रस्तुत करते चलते हैं। ये साधारण चित्र नहीं हैं, अपितु राष्ट्र परिणामी परिप्रेक्ष्य में घटना, संदर्भ, काल, मनोवृत्ति और पूर्वापर प्रसंगों के ऐतिहासिक मूल्यांकन व महत्व के साक्षी-प्रमाण हैं।
सचमुच ये सभी चित्र राष्ट्रीय इतिहास की धरोहर हैं। ऐतिहासिक प्रमाणों से पुष्ट इस तथ्य को रेखांकित करना आवश्यक है कि महात्मा गांधी के सत्प्रयासों से भी कई वर्ष पूर्व वीर सावरकर ने विदेशी वस्त्रों की होली, हिन्दू धर्म में अस्पृश्यता निवारण, मंदिरों में दलितों का प्रवेश, जातीय भेदभाव का विरोध, अन्तरजातीय विवाह, विधवा-विवाह, स्त्री-शिक्षा, शुध्दीकरण, स्मृतियों की दिनातीत धारणाओं के त्याग, विज्ञान-सम्मत विश्वासों, तर्क-प्रमाणित परंपराओं व नूतन ज्ञान-विज्ञान के अनुरूप चिंतन व सामाजिक आचरण पर बल दिया था। इस दृष्टि से सावरकर दैनंदिनी ग्रंथ राष्ट्रीय इतिहास का एक ऐसा महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया है, जो कि हर भारतीय, विशेषकर युवा पीढ़ी के लिए पठनीय, माननीय और संग्रहणीय है। यदि इस ग्रंथ का भाव-संकल्प हमारे आचरण का विषय बन सके, तो समझो कि नए भारत राष्ट्र का सूर्योदय होने को है।

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