एनी बेसेंट : विदेशी मिट्टी और भारतीय मन

भारतवर्ष के इतिहास में 19वीं शताब्दी कई अर्थों में महत्वपूर्ण रही है। भारतीय पुनर्जागरण उन्हीं अर्थों में एक है। भारतीय राष्ट्रीय जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी तीन विदेशी महिलाएँ उल्लेखनीय हैं- सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन और एनी बेसेंट। तीनों ने ही अपनी कर्मस्थली भारत को बनाया जहाँ वे देशवासी की तरह रहीं एवं पंचतत्व में विलीन हुईं। सिस्टर निवेदिता विवेकानंद एवं मीरा बेन गांधी जी के आदर्शों से प्रेरित होकर भारत आईं लेकिन एनी बेसेंट भारतीय दर्शन एवं हिन्दू धर्म के आकर्षण से थियोसॉफी के प्रसार हेतु भारत आईं। उनका भारत से अद्भुत अनुराग था और भारतवासियों द्वारा उन्हें दिया गया सम्मान एवं आदर भी देखने वाला था।
एनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर 1847 को लंदन के वुड परिवार में हुआ। एनी बेसेंट के पिता एक कुशल चिकित्सक एवं कई भाषाओं के ज्ञाता थे। एनी बेसेंट जब पाँच वर्ष की थीं तभी उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। उनका पालन-पोषण उनकी माँ द्वारा अभावों की स्थितियों में हुआ। एनी बेसेंट के बचपन में ही उनकी अद्भुत प्रतिभा झलकने लगी थी जिससे प्रभावित होकर एक शिक्षाविद् महिला सुश्री मेरियट ने उन्हें उनकी माँ से अपने संरक्षण में ले लिया। सुश्री मेरियट के संरक्षण में उन्होंने 16 वर्ष तक विद्यार्जन, यूरोप की यात्रा तथा जर्मन, लैटिन एवं फ्रेंच भाषाओं का गहन अध्ययन किया। एनी बेसेंट का विवाह 22 वर्ष की उम्र में गिरजाघर के पादरी रेवेरेंड फ्रैंक बेसेंट से हुआ। उनके दो बच्चे हुए किन्तु स्वभाव से स्वतंत्र विचारशील धार्मिक प्रवृत्ति के कारण उनका अपने पति से अन्तर्विरोध था और इसी के चलते उन्होंने पति से संबंध विच्छेद कर सम्पूर्ण मानवता से नाता जोड़ने का संकल्प लिया। उनके दोनों बच्चे ब्रिटिश क़ानून के कारण उनके पति के पास ही रहे। तत्पश्चात् एनी बेसेंट ने गंभीर आर्थिक संकट के समय स्वतंत्र विचार संबंधी लेख लिखकर धनोपार्जन किया। महान ख्यातिलब्ध पत्रकार विलियम स्टीड के संपर्क में उन्होंने लेखन एवं प्रकाशन का कार्य रुचिपूर्वक किया। वह इंगलैंड की सबसे शक्तिशाली महिला ट्रेड यूनियन की सचिव रहीं एवं अपना अधिकांश समय मजदूरों, अकाल पीड़ितों तथा अभावग्रस्तों को सुविधाएँ दिलाने में व्यतीत किया।
सन् 1882 में वे थियोसाफिकल सोसायटी की संस्थापिका मैडम ब्लावत्सकी के संपर्क में आईं एवं पूर्ण रूप से संत संस्कारों वाली महिला बन गईं। सन् 1889 में उन्होंने अपने को थियोसाफिस्ट घोषित किया एवं शेष जीवन भारत की सेवा में अर्पित करने की घोषणा की। 16 नवंबर 1893 को वे एक वृहद कार्यक्रम के साथ वह भारत आईं और सांस्कृतिक नगर काशी (बनारस) को अपना केन्द्र बनाया। काशी के तत्कालीन नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह से भेंट की और उनकी कृपा स्वरूप कामच्छा स्थित काशी नरेश सभा भवन के आस-पास की भूमि प्राप्त कर 7 जुलाई 1898 को सेंट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की। सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह, जातीय व्यवस्था, विधवा विवाह, विदेश यात्रा आदि को दूर करने के लिए ब्रदर्स ऑफ सर्विस नामक संस्था बनाई। उन्होंने अपने 40 वर्ष भारत के सर्वांगीण विकास में लगाये।
उस समय महामना मदन मोहन मालवीय एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे परंतु नियमानुसार इसके लिए एक कॉलेज का होना अनिवार्य था। मालवीय जी ने एनी बेसेंट के समक्ष सेन्ट्रल हिंदू कॉलेज का प्रस्ताव रखा तो एनी बेसेंट ने तत्काल स्वीकार करते हुए कहा: मेरे पास जो कुछ भी है वह देश के लिए ही है, यह विद्यालय आपका ही है पंडित जी!
वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सह-संस्थापिका के रूप में जानी जाती हैं। एनी बेसेंट ने भारत में पुनर्जागरण हेतु शिक्षा, नारी शिक्षा, आध्यात्मिक साहित्य का सृजन एवं विकास, धर्म का प्रसार, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ कर दिया। वे एक अत्यंत कुशल संस्थापिका, लेखिका एवं उच्चकोटि की वक्ता थीं। भारत को स्वतंत्र कराने के प्रति वह चिन्तित थीं एवं इस दिशा में कार्य हेतु यहाँ के राजनीतिज्ञों से भी संपर्क बनाने लगी थीं। देशवासियों ने उन्हें माँ वसंत कहकर सम्मानित किया तो महात्मा गांधी ने उन्हें ‘वसंत देवी’ की उपाधि से विभूषित किया। भारतीय राजनीति में उन्होंने 1914 में 68 वर्ष की उम्र में प्रवेश किया और आते ही एक अत्यन्त प्रभावशाली क्रांतिकारी आंदोलन होम रूल का प्रारंभ किया। यह आंदोलन भारतीय एवं कांग्रेस की राजनीति का एक नया जन्म माना जाता है। उस आंदोलन ने भारत की राजनीति तथा ब्रिटिश सरकार की नीति में आमूल परिवर्तन ला दिया। उस समय के मशहूर क़ौमी शायर ब्रजनारायण चकबस्त ने होमरूल पर एक नज़्म भी कही जिसमें एनी बेसेंट के प्रति देशवासियों का आदर झलकता है।
एनी बेसेंट ने पूरे देश का भ्रमण प्रारंभ कर दिया। उन्होंने जगह-जगह पर होम रूल की शाखाएँ खोलीं तथा लोगों को स्वराज्य का अर्थ एवं उपयोगिता को समझाया। उन्होंने विशाल प्रचार सामग्री तैयार की। यह भारतीय राजनीति में एक नया क़दम था। 1914 मे ही उन्होंने दो पत्रिकाएँ ‘न्यू इंडिया दैनिक’ तथा ‘द कॉमन व्हील साप्ताहिक’ प्रकाशित करवाईं। उन पत्रिकाओं में ब्रिटिश शासन के विरोध में लिखने के कारण उन्हें 20 हज़ार रुपये का दंड भी देना पड़ा। उन्होंने अमरीका तथा इंग्लैंड में भी होमरूल की शाखाएँ खोलीं। वे शाखाएँ भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्य करती थीं।
इंग्लैंड की होम रूल शाखा के मुख्य कार्यकर्ता लार्ड लेंसबरी तथा जार्ज बर्नाड शा जैसे महान व्यक्ति थे। उन्होंने एक और महत्वपूर्ण कार्य किया था और यह था कि वैचारिक रूप से अलग हो गये लोकमान्य तिलक तथा गोखले को 1907 में अपने प्रयासों से मिलाया। कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में एकता बनाई तथा हिन्दू और मुस्लिम समुदायों में भी एकता स्थापित करने में मुख्य भूमिका निभाई। 1917 में एनी बेसेंट को उनके दो सहयोगियों के साथ नज़रबंद कर दिया गया। फलस्वरूप पूरे देश में सभाएँ हुईं, जुलूस निकले, महिलाओं ने खुलकर भाग लिया। अन्त में ब्रिटिश शासन ने उन्हें मुक्त किया तथा क़ानून में कई सुधारों की घोषणा भी की। 1917 में ही कलकत्ता में कांग्रेस की सभा में उन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। 1919 तक वे सक्रिय राजनीति में रहने के पश्चात् राजनीति से अलग हो गईं।
एनी बेसेंट के जीवन का मूल मंत्र था- कर्म। वह जिस सिध्दांत पर विश्वास करती थीं उसे अपने जीवन में उतार लेती थीं। वह स्वभावत: धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। उनके राजनीतिक विचार की आधारशिला थी उनके आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्य। उनका विचार था कि अच्छाई के मार्ग का निर्धारण बिना आध्यात्म के संभव नहीं है। राष्ट्र का विकास एवं निर्माण तभी संभव है, जब उस देश के विभिन्न धर्मों, मान्यताओं एवं संस्कृतियों में एकता स्थापित हो। उनका उद्देश्य था हिन्दू समाज एवं उसकी आध्यात्मिकता में आई विकृतियों को दूर करना।
उन्होंने भारतीय धर्म का गंभीर अध्ययन किया। उन्होंने गीता का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने लगभग 200 पुस्तकें लिखी हैं। कई पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। उन्हें छह जुलाई 1907 में ही थियोसाफिकल सोसायटी का अध्यक्ष चुन लिया गया था जो वे जीवन पर्यन्त रहीं। 1908 में अडयार (चेन्नई) में वसंत प्रेस का शुभारंभ किया। 1918 में इंडियन भारत स्कॉउट की नींव रखी। 14 दिसंबर 1921 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने इन्हें डॉक्टर ऑफ़ लेटर्स की उपाधि से विभूषित किया।
अडयार में जो थियोसाफिकल सोसायटी का अन्तरराष्ट्रीय मुख्यालय है, उन्होंने सभी धर्मों के मन्दिरों की स्थापना की। साथ ही विश्व बंधुत्व की भावना बढ़ाने पर निरंतर ज़ोर देती रहीं। इन्ही संदर्भों में उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण कार्य था कि विश्व के महान दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति को 1909 में अपने माता–पिता से अपने संरक्षण में ले लेना। तब जे.कृष्णमूर्ति की आयु पाँच वर्ष थी। उन्हीं के संरक्षण में कृष्णमूर्ति ने ज्ञानार्जन किया। एनी बेसेंट ने यह कार्य मातृत्व के सर्वोच्च आदर्शों के अनुरूप ही किया। आज जे.कृष्णमूर्ति विश्वगुरु के रूप में सम्मानित हैं।
ऐसी भारत प्रेमी, हिन्दू धर्म प्रेमी एवं सच्चे अर्थों में शिक्षा शास्त्री एनी बेसेंट ने 20 सितंबर सन् 1933 को अडयार चेन्नई में अपनी शरीर छोड़ दिया। उनकी इच्छाओं के अनुसार भारतीय पध्दति से उनका दाह संस्कार हुआ। उनका अस्थि कलश बनारस लाया गया तथा दशाश्वमेध घाट पर उसका विसर्जन हुआ।

क्या है थियोसाफी?
थियोसाफिकल सोसाइटी की स्थापना 1875 में मैडम एच.पी.ब्लैवेत्स्की और कर्नल एच.एस.आल्काट ने अन्य सहयोगियों के साथ अमेरिका में की थी। सन् 1879 में इसका मुख्यालय मुंबई में स्थानांतरित हुआ तदुपरांत सन् 1882 में अडयार (चेन्नई) में स्थापित हो गया। यह एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था है, इसकी शाखाएँ 56 देशों में हैं।

थियोसाफिकल सोसाइटी के तीन उद्देश्य हैं-
1) जाति-धर्म, नर और नारी, वर्ण तथा रंग-भेद से रहित, मानवता के विश्व बंधुत्व का सजीव केन्द्र स्थापित करना।
2) तुलनात्मक धर्म, दर्शन और विज्ञान के अध्ययन को प्रोत्साहन देना।
3) प्रकृति के अज्ञात नियमों तथा मानव में अन्तर्निहित शक्तियों का अनुसंधान करना।

इस सोसाइटी के प्रथम अध्यक्ष कर्नल एच.एस.आल्काट रहे। इसके बाद क्रमश: डॉ.एनी बेसेंट (1907-1933), डॉ.जी.एस.अरुन्डेल (1934–1945), सी.जिनराजदास (1946-1953), एन.श्रीराम (1953-1973), जॉन बी.एस.कोट्स (1973–1981) बने। वर्तमान में श्रीमती राधा बर्नियर 1982 से इस अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की अध्यक्ष हैं।
किसी भी धर्म का व्यक्ति जो थियोसाफी के तीन उद्देश्यों को अनुमोदित करता हो, इसका सदस्य हो सकता है। इस संस्था के सदस्यों की आपस में समानता किसी एक विश्वास की मान्यता पर आधरित न होकर समान रूप से सत्यान्वेषण की दिशा में चलने पर आधारित है। सोसाइटी के प्रतीक चिन्ह पर लिखा है: सत्यानास्ति परो धर्म: (सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं है)।
थियोसाफी जिसे ब्रह्म विद्या भी कहते हैं, उस सत्य का स्वरूप है जो सभी धर्मों का आधार है और उस सत्य पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता है। यह जीवन को बोधगम्य बनाने का दर्शन प्रस्तुत करती है, जिसके द्वारा न्याय तथा प्रेम का निरूपण या प्रगटीकरण होता है और जीवन के विकास का मार्ग निर्देशित होता है। थियोसाफी के अनुसार मृत्यु भी न्यायसंगत है, क्योंकि इसके द्वारा जीवन की पुनरावृत्ति की क्रियाएँ तथा नये व पूर्ण जीवन हेतु कान्तिमय एवं उल्लासमय अस्तित्व में प्रवेश मिलता है।
थियोसाफी विश्व-आत्मा के विज्ञान का बोध कराती है। मनुष्य को बताती है कि वह स्वयं आत्म-तत्व है, मन व शरीर उसके वाहक हैं। यह सभी धर्मों के धार्मिक ग्रंथों तथा गूढ़ सत्यों को अनावृत्ति करके उसे बोधगम्य बनाती है जो बुध्दि की पहुँच से परे है किन्तु उसे अन्त: प्रज्ञा द्वारा पुष्ट किया जा सकता है।
थियोसाफिकल सोसाइटी के दो आधार स्तंभ हैं- बंधुत्व एवं स्वतंत्रता। थियोसाफिकल सोसाइटी अपने सदस्यों पर विश्वास के रूप में अपना साहित्य, संसार के संबंध में अपना दृष्टिकोण या अन्य विचार नहीं थोपती है। इसमें कोई भी ऐसी मान्यताएँ तथा धारणाएँ नहीं है जिन्हें स्वीकार करना अनिवार्य हो। जो भी जिज्ञासु विश्व बंधुत्व में आस्था रखता है वही थियोसाफिस्ट है।

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